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विचार: अति की हदों को पार करती असहमति

प्रकाशित: 01-09-2026 | 06:44 PM
विचार: अति की हदों को पार करती असहमति
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विचार: अति की हदों को पार करती असहमतियह एक तथ्य है कि जनभागीदारी वाले कई सामाजिक अभियान महज मोदी सरकार के अभियान बनकर रह गए हैं। यह स्थिति तब है, जब देश में कई समस्याएं ऐसी हैं, जिनका समाधान जनता की सामूहिक भागीदारी से ही किया जा सकता है।HighLightsराजनीतिक असहमति ने विरोध की सभी हदें पार कर दी हैं।नकारात्मक राजनीति से सामाजिक विमर्श और राष्ट्रीय अभियान प्रभावित।राष्ट्रीय एकता परिषद को सक्रिय करना समय की मांग। राजीव सचान। इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही की जीडीपी विकास दर 7.8 प्रतिशत रहने पर प्रधानमंत्री मोदी ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए जब यह कहा कि वैश्विक अनिश्चितताओं और चुनौतियों के बावजूद यह वृद्धि देश के लोगों की सामूहिक शक्ति और आर्थिक आत्मविश्वास का परिणाम है तो कांग्रेस को यह बिल्कुल रास नहीं आया। उसने अर्थव्यवस्था की तमाम कमजोरियों का उल्लेख करते हुए मोदी सरकार को निशाने पर लिया। ऐसा नहीं है कि आर्थिक मोर्चे पर किसी तरह की समस्याएं नहीं हैं, लेकिन कांग्रेस का उद्देश्य उन्हें गिनाना नहीं, बल्कि यह सिद्ध करना था कि जीडीपी में वृद्धि किसी तरह की उपलब्धि नहीं है। उसने यह काम पूरी शिद्दत से किया और इसके लिए कई प्रवक्ताओं को मैदान में उतारा। निःसंदेह किसी को यह अपेक्षा नहीं करनी चाहिए कि विपक्ष सरकार की प्रशंसा करेगा। विपक्ष का काम सरकार की खामियों को इंगित करना और उसकी गलतियों के लिए उसे कठघरे में खड़ा करना है। इससे ही सरकारों पर दबाव बनता है और वे सही तरह काम करने के लिए बाध्य होती हैं, लेकिन पिछले लगभग दो दशकों से असहमति की राजनीति अपनी हदों को पार कर विरोध के लिए विरोध की राजनीति में बदल चुकी है। विरोध के लिए विरोध की राजनीति के चलते आज राजनीतिक माहौल इतना कटुतापूर्ण, छिद्रान्वेषी और नकारात्मक हो गया है कि यदि कोई नेता ऐसा कुछ कह दे कि नियमों का पालन करें और संयम एवं अनुशासन का परिचय दें तो विरोधी दल के नेता इसका भी विरोध करने के लिए आगे आ सकते हैं। इसके लिए उनके पास तरह-तरह के (कु)तर्क भी होंगे। कटु एवं नकारात्मक राजनीतिक विमर्श का असर सामाजिक विमर्श पर भी पड़ रहा है। यह एक तथ्य है कि सोशल मीडिया कहे जाने वाले डिजिटल प्लेटफार्मों पर विचार-विमर्श का स्थान गाली-गलौज ने ले लिया है। इसका कारण यह है कि राजनीतिक दलों के आइटी सेल विरोधी दलों के नेताओं पर प्रायः बिलो द बेल्ट यानी अपमानजनक प्रहार करते ही रहते हैं। अब ऐसे प्रहार करने के लिए एआइ का भी सहारा लिया जा रहा है। कई बार इसकी चपेट में महिला नेता भी आ जाती हैं। इसके नतीजे में राजनीतिक और सामाजिक माहौल बुरी तरह दूषित हो रहा है। इस प्रदूषण के दूर होने की कोई सूरत नहीं दिखती। कटुतापूर्ण राजनीति ने महापुरुषों को भी बांट दिया है। अब राजनीति और समाज के स्तर पर लोग किसी राष्ट्रीय दायित्व या अभियान के प्रति कठिनाई से ही एकमत और एकजुट होते दिखते हैं, जबकि देश की कई समस्याएं ऐसी हैं, जिन्हें लोगों की सामूहिक भागीदारी से ही दूर किया जा सकता है, जैसे सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी से मुक्ति। आज स्वच्छ भारत जैसे अभियान असरहीन होते दिख रहे हैं तो इसीलिए कि इस अभियान में आम जनता की पहली जैसी भागीदारी नहीं दिखती। जब यह अभियान शुरू हुआ था तो आम लोगों की इसमें दिलचस्पी और भागीदारी दिख रही थी कि सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी न फैले, लेकिन अब वह दिखाई नहीं देती। यह एक ऐसा अभियान है, जो आम जनता की भागीदारी के बिना सफल नहीं हो सकता। यदि लोग सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी फैलने से रोकने के लिए सक्रिय-सचेत नहीं रहते तो सरकारें और उनकी एजेंसियां कुछ भी कर लें, बात बनने वाली नहीं है। विडंबना यह है कि जब से यह अभियान शुरू हुआ, तबसे शायद ही किसी विपक्षी नेता ने इसे सफल बनाने में अपने लोगों को भागीदार बनने के लिए प्रेरित किया हो। कुछ ऐसी ही स्थिति बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे अभियानों की भी है। विरोधी राजनीतिक दलों को लगता है कि जिस दल ने इन अभियानों को शुरू किया, उनके लोगों को ही इनमें भागीदार बनने की आवश्यकता है। शायद यही कारण है कि हर घर तिरंगा जैसे अभियानों में भी सभी राजनीतिक दलों की भागीदारी नहीं दिखती। इसमें गहन संदेह है कि अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर विरोधी राजनीतिक दल किसी तरह का उत्साह-उमंग दिखाते होंगे। हैरानी नहीं कि मोदी सरकार के हटते ही इस दिवस को मनाना ही बंद कर दिया जाए। यह एक तथ्य है कि जनभागीदारी वाले कई सामाजिक अभियान महज मोदी सरकार के अभियान बनकर रह गए हैं। यह स्थिति तब है, जब देश में कई समस्याएं ऐसी हैं, जिनका समाधान जनता की सामूहिक भागीदारी से ही किया जा सकता है। संकट यह है कि अब राजनीतिक दल किसी भी मुद्दे पर एकमत नहीं होते-न तो संसद में और न ही संसद के बाहर। हालांकि इसके लिए राष्ट्रीय एकता परिषद के रूप में एक मंच है, लेकिन वह लंबे समय से निष्क्रिय है। यह सही समय है कि इस निष्क्रिय मंच को सक्रिय किया जाए। राष्ट्रीय एकता परिषद एक गैर-संवैधानिक निकाय है। इस परिषद के अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं। इसके सदस्यों में सभी मुख्यमंत्री, राजनीतिक दलों के नेता, विभिन्न आयोगों के अध्यक्ष, उद्योग, व्यापार, मीडिया और श्रमिक संघों के प्रतिनिधि होते हैं। इसकी स्थापना 1961 में की गई थी। कहीं यह मंच इसलिए तो निष्क्रिय नहीं कि इसकी स्थापना प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने की थी? जो भी हो, यह ध्यान रहे कि इस परिषद का उद्देश्य सांप्रदायिकता, जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद और संकीर्णता जैसी समस्याओं का सामना करना था। कोई इससे इन्कार नहीं कर सकता कि इन समस्याओं का सामना करने की आवश्यकता आज भी है और इसकी पूर्ति सबके सहयोग से ही संभव है। (लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडिटर हैं)
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