श्रीनगर: जम्मू-कश्मीर के सरकारी स्कूलों की लाइब्रेरी में पहुंची एक विवादित पुस्तक को लेकर बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक विवाद खड़ा हो गया है। आरोप है कि पुस्तक में कुछ अलगाववादी नेताओं और आतंकवाद से जुड़े व्यक्तियों को "महान व्यक्तित्व", "लेजेंड" और "शहीद" जैसे शब्दों से संबोधित किया गया है। मामला सामने आने के बाद प्रदेश में तीखी राजनीतिक प्रतिक्रिया देखने को मिली। प्रशासन ने पुस्तक को तत्काल स्कूलों से वापस लेने का फैसला किया है और इसके चयन व वितरण की जांच शुरू कर दी है।

विवाद "Great Personalities and Legends of J&K (Series-4)" नामक पुस्तक को लेकर है। यह पुस्तक कथित रूप से समग्र शिक्षा (Samagra Shiksha) योजना के तहत सरकारी स्कूलों की लाइब्रेरी के लिए खरीदी गई थी। नागरिक संगठन जम्मू एंड कश्मीर पीपुल्स फोरम (JKPF) ने आरोप लगाया कि पुस्तक में मकबूल भट सहित कई अलगाववादी नेताओं और विवादित व्यक्तियों का महिमामंडन किया गया है। संगठन का कहना है कि ऐसे व्यक्तियों को छात्रों के लिए प्रेरणास्रोत के रूप में प्रस्तुत करना गंभीर चिंता का विषय है।

सार्वजनिक रिपोर्टों के अनुसार, पुस्तक के कुछ अध्यायों में मकबूल भट के नाम के साथ "शहीद" और "शहीद-ए-आज़म" जैसे शब्दों का उपयोग किया गया है। इसके अलावा, कुछ अलगाववादी नेताओं को "महान व्यक्तित्व" या "लेजेंड" के रूप में प्रस्तुत किए जाने का आरोप है। आलोचकों का कहना है कि इस तरह की भाषा भारत की आधिकारिक संवैधानिक और कानूनी स्थिति के अनुरूप नहीं है और इससे छात्रों तक भ्रामक संदेश जा सकता है। हालांकि पुस्तक के लेखक या प्रकाशक की ओर से इन आरोपों पर विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
विवाद बढ़ने के बाद जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने संबंधित पुस्तक को सरकारी स्कूलों की लाइब्रेरी से तत्काल वापस लेने का आदेश दिया। साथ ही, पुस्तक के चयन, अनुमोदन और वितरण की प्रक्रिया की विभागीय जांच शुरू कर दी गई। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने शिक्षा विभाग के कई अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करते हुए कुछ अधिकारियों को निलंबित किया तथा पूरे मामले की जांच के निर्देश दिए।
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इस मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने जम्मू-कश्मीर सरकार और शिक्षा विभाग पर तीखा हमला बोला। भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया कि इस प्रकार की सामग्री छात्रों के बीच गलत संदेश देती है और इसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। दूसरी ओर, मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने मीडिया से बातचीत में कहा कि उन्होंने स्वयं पुस्तक नहीं पढ़ी है और मामले की जानकारी मिलने के बाद प्रशासन आवश्यक कार्रवाई कर रहा है।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी सरकारी स्कूल में शामिल होने वाली पुस्तक को कई स्तरों की समीक्षा और तथ्यात्मक जांच से गुजरना चाहिए। इतिहास और राजनीति जैसे संवेदनशील विषयों पर सामग्री तैयार करते समय संतुलित भाषा, प्रमाणिक स्रोत और संवैधानिक मूल्यों का पालन अत्यंत आवश्यक है। यदि किसी पुस्तक में विवादित या तथ्यात्मक रूप से आपत्तिजनक सामग्री पाई जाती है तो उसका स्वतंत्र मूल्यांकन किया जाना चाहिए, ताकि विद्यार्थियों को निष्पक्ष और प्रमाणिक जानकारी मिल सके।
अब तक उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के अनुसार, यह स्पष्ट है कि पुस्तक को लेकर विवाद के बाद प्रशासन ने इसे स्कूलों से वापस लेने और जांच शुरू करने की पुष्टि की है। हालांकि पुस्तक की सभी सामग्री पर अंतिम आधिकारिक निष्कर्ष अभी जांच के बाद ही सामने आएंगे। इसलिए यह कहना उचित होगा कि पुस्तक में मौजूद सामग्री को लेकर गंभीर आरोप लगे हैं, जिनकी जांच जारी है, और अंतिम जिम्मेदारी जांच पूरी होने के बाद ही तय होगी।