आजमगढ़: जिले के अंबेडकर पार्क में सामाजिक कार्यकर्ता लाल बिहारी 'मृतक' ने 'जीवित मृतक दिवस' मनाया। यह आयोजन उन्हें सरकारी रिकॉर्ड में मृत घोषित किए जाने के 50 वर्ष पूरे होने के अवसर पर किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लिया और पहचान, अधिकार तथा न्याय की लड़ाई को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।
'मृतक संघ' के बैनर तले हुआ आयोजन
कार्यक्रम का आयोजन मृतक संघ के तत्वावधान में किया गया। इस दौरान सरकारी रिकॉर्ड में मृत घोषित किए गए लोगों के अधिकारों और उन्हें न्याय दिलाने के मुद्दों पर चर्चा की गई।
22 साल लंबी कानूनी लड़ाई को किया याद
लाल बिहारी ने अपने संबोधन में बताया कि उन्हें कथित रूप से पैतृक संपत्ति हड़पने के उद्देश्य से सरकारी अभिलेखों में मृत घोषित कर दिया गया था। इसके बाद उन्होंने अपनी पहचान वापस पाने के लिए 22 वर्षों तक कानूनी लड़ाई लड़ी।
1994 में अदालत के आदेश पर मिले जीवित होने का दर्जा
लाल बिहारी ने बताया कि वर्ष 1994 में अदालत के आदेश के बाद उन्हें सरकारी रिकॉर्ड में दोबारा जीवित घोषित किया गया। उन्होंने कहा कि यह संघर्ष केवल उनकी व्यक्तिगत लड़ाई नहीं, बल्कि व्यवस्था में सुधार की भी एक पहल थी।
संघर्ष के बाद की 'मृतक संघ' की स्थापना
अपने अनुभव के बाद लाल बिहारी ने 'मृतक संघ' की स्थापना की। यह संगठन वर्षों से उन लोगों की मदद कर रहा है जिन्हें किसी कारणवश सरकारी रिकॉर्ड में मृत घोषित कर दिया गया है और जो अपनी पहचान बहाल कराने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
फिल्म 'कागज़' से देशभर में मिली पहचान
लाल बिहारी के संघर्ष की कहानी फिल्म 'कागज़' के माध्यम से भी देशभर में चर्चा का विषय बनी। कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने उनके संघर्ष को प्रेरणादायक बताते हुए न्याय और अधिकार की लड़ाई को आगे बढ़ाने का संकल्प दोहराया।