इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद के खिलाफ कथित रूप से फेसबुक पर जातिसूचक और अपमानजनक टिप्पणी करने के आरोपी को राहत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी की डिस्चार्ज (अपराध से उन्मोचित करने) की अर्जी खारिज किए जाने के आदेश को बरकरार रखते हुए उसकी आपराधिक अपील भी खारिज कर दी।
ट्रायल कोर्ट के आदेश को दी थी चुनौती
न्यायमूर्ति संतोष राय की पीठ ने चंद्र प्रकाश सिंह उर्फ गोली ठाकुर की ओर से दायर आपराधिक अपील पर सुनवाई की। अपीलकर्ता ने हमीरपुर की ट्रायल कोर्ट द्वारा उसकी डिस्चार्ज याचिका खारिज किए जाने के आदेश को चुनौती दी थी। आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 352, आईटी अधिनियम की धारा 66 और एससी/एसटी अधिनियम की धारा 3(1)(ध) के तहत थाना सुमेरपुर, जिला हमीरपुर में मामला दर्ज है।
आरोपी ने एफआईआर पर उठाए सवाल
अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि एफआईआर लगभग सात दिन की देरी से दर्ज की गई और उसमें कथित तौर पर इस्तेमाल किए गए किसी विशिष्ट जातिसूचक शब्द का उल्लेख नहीं है। साथ ही यह भी तर्क दिया गया कि आरोप अस्पष्ट हैं और एससी/एसटी अधिनियम के तहत अपराध के आवश्यक तत्व पूरे नहीं होते।
राज्य सरकार ने किया विरोध
राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि आरोपी का नाम एफआईआर में स्पष्ट रूप से दर्ज है। जांच के दौरान कथित आपत्तिजनक फेसबुक पोस्ट सहित पर्याप्त प्रथम दृष्टया साक्ष्य एकत्र किए गए हैं। अभियोजन पक्ष के गवाहों ने भी आरोपों का समर्थन किया है, इसलिए इस स्तर पर विस्तृत साक्ष्य परीक्षण की आवश्यकता नहीं है।
फेसबुक पोस्ट और गवाहों के बयान को माना अहम
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए कहा कि भले ही एफआईआर में कथित जातिसूचक शब्दों का स्पष्ट उल्लेख नहीं था, लेकिन उसमें सांसद चंद्रशेखर आजाद के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी किए जाने का आरोप दर्ज है। अदालत ने यह भी नोट किया कि जांच अधिकारी ने कथित आपत्तिजनक फेसबुक पोस्ट को रिकॉर्ड में शामिल किया और गवाहों के बयानों में कथित अपशब्दों का उल्लेख किया गया है, जो अभियोजन पक्ष के मामले का प्रथम दृष्टया समर्थन करते हैं।
'आरोप तय करने के चरण में नहीं होगा मिनी ट्रायल'
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि आरोप तय करने या अभियोग जारी करने के चरण में अदालत का दायित्व केवल यह देखना होता है कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं। इस स्तर पर साक्ष्यों का विस्तृत मूल्यांकन या "मिनी ट्रायल" करना न्यायालय का कार्य नहीं है। इसी आधार पर अदालत ने आरोपी की अपील खारिज कर दी।