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बंगाल कांग्रेस में बढ़ी अंदरूनी खींचतान: मालदा में दो गुटों के बीच टकराव, संगठन पर उठे सवाल

प्रकाशित: 05-07-2026 10:49 AM
बंगाल कांग्रेस में बढ़ी अंदरूनी खींचतान: मालदा में दो गुटों के बीच टकराव, संगठन पर उठे सवाल
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कोलकाता/मालदा: पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की अंदरूनी कलह एक बार फिर खुलकर सामने आ गई है। पार्टी के पारंपरिक गढ़ माने जाने वाले मालदा जिले में दो गुटों के बीच कथित टकराव ने संगठन की एकजुटता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना ऐसे समय सामने आई है, जब कांग्रेस राज्य में अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रही है। इस घटनाक्रम ने पार्टी के भीतर गुटबाजी और नेतृत्व को लेकर चल रही चर्चाओं को भी तेज कर दिया है।

क्या है पूरा मामला?

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मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मालदा में कांग्रेस के दो स्थानीय गुटों के बीच एक संगठनात्मक कार्यक्रम के दौरान विवाद शुरू हुआ, जो बाद में धक्का-मुक्की और हंगामे तक पहुंच गया। घटना का वीडियो भी सोशल मीडिया पर सामने आया, जिसके बाद राजनीतिक हलकों में इसकी चर्चा तेज हो गई।

रिपोर्टों के मुताबिक, विवाद स्थानीय संगठन पर नियंत्रण, नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय को लेकर उत्पन्न हुआ। हालांकि घटना के बाद पार्टी नेताओं ने स्थिति को सामान्य करने की कोशिश की और कहा कि संगठन के भीतर उत्पन्न मतभेदों का समाधान पार्टी मंच पर किया जाएगा।

ईशा खान चौधरी का नाम क्यों चर्चा में?

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घटना के बाद कांग्रेस सांसद ईशा खान चौधरी का नाम भी चर्चा में आया। मालदा दक्षिण से सांसद ईशा खान चौधरी, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता स्वर्गीय ए.बी.ए. गनी खान चौधरी के राजनीतिक परिवार से आते हैं और मालदा में कांग्रेस की राजनीति में उनका प्रभाव माना जाता है।

मालदा लंबे समय तक गनी खान चौधरी परिवार का मजबूत राजनीतिक आधार रहा है। यही वजह है कि जिले में संगठन से जुड़ा कोई भी विवाद राज्य की राजनीति में विशेष महत्व रखता है।

मालदा कांग्रेस के लिए क्यों महत्वपूर्ण?

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मालदा को पश्चिम बंगाल में कांग्रेस का पारंपरिक गढ़ माना जाता रहा है। एक समय यहां कांग्रेस का मजबूत जनाधार था और पार्टी लगातार चुनावी सफलता हासिल करती रही। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), भाजपा और अन्य दलों के उभार के कारण कांग्रेस की स्थिति कमजोर हुई है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि ऐसे समय में संगठन के भीतर गुटबाजी बढ़ती है, तो इसका असर पार्टी की भविष्य की रणनीति और चुनावी प्रदर्शन पर पड़ सकता है।

कांग्रेस के सामने संगठनात्मक चुनौती

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पश्चिम बंगाल में कांग्रेस पिछले कुछ वर्षों से अपने संगठन को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों और कुछ नेताओं के पार्टी में आने-जाने के बीच संगठन को एकजुट रखना नेतृत्व के लिए बड़ी चुनौती माना जा रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि विधानसभा चुनाव के बाद पार्टी के सामने सबसे बड़ी आवश्यकता मजबूत स्थानीय नेतृत्व, कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय और स्पष्ट संगठनात्मक रणनीति तैयार करने की है।

विपक्षी दलों ने भी साधा निशाना

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घटना के बाद विपक्षी दलों ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि जो पार्टी अपने संगठन को एकजुट नहीं रख पा रही, वह जनता के मुद्दों पर प्रभावी राजनीति कैसे करेगी।

हालांकि कांग्रेस नेताओं का कहना है कि बड़े राजनीतिक दलों में समय-समय पर मतभेद होना सामान्य बात है और पार्टी लोकतांत्रिक तरीके से सभी मुद्दों का समाधान करती है।

क्या बोले पार्टी नेता?

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घटना के बाद कांग्रेस के स्थानीय नेताओं ने अपील की कि कार्यकर्ता संयम बनाए रखें और संगठन की एकता को प्राथमिकता दें। पार्टी सूत्रों के अनुसार, मामले की जानकारी प्रदेश नेतृत्व तक पहुंचा दी गई है और आवश्यक होने पर संबंधित नेताओं से रिपोर्ट भी मांगी जा सकती है।

फिलहाल कांग्रेस की ओर से इस विवाद को लेकर कोई विस्तृत आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है।

राजनीतिक असर क्या हो सकता है?

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राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मालदा जैसे महत्वपूर्ण जिले में संगठनात्मक विवाद कांग्रेस के लिए चिंता का विषय हो सकता है। यदि समय रहते मतभेद दूर नहीं किए गए, तो इसका असर स्थानीय संगठन के साथ-साथ भविष्य के चुनावी अभियान पर भी पड़ सकता है।

दूसरी ओर, यदि पार्टी नेतृत्व इस विवाद का शीघ्र समाधान कर लेता है, तो संगठन को दोबारा सक्रिय और एकजुट करने का अवसर भी मिल सकता है।

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