हाईकोर्ट की यह टिप्पणी उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले से जुड़े एक कथित निकाह-हलाला मामले की सुनवाई के दौरान आई। इस मामले में आरोपियों ने दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की थी, लेकिन अदालत ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया गंभीर आरोप सामने आए हैं और ऐसे मामलों में जांच पूरी होने से पहले हस्तक्षेप करना उचित नहीं होगा।

मामला अमरोहा जिले की एक महिला की शिकायत से जुड़ा है। पीड़िता का आरोप है कि उसे पहले उसके पति ने तीन तलाक दिया और बाद में दोबारा साथ रहने के लिए निकाह-हलाला करने का दबाव बनाया गया।
महिला का आरोप है कि हलाला की प्रक्रिया के नाम पर उसके साथ कई लोगों द्वारा यौन शोषण किया गया। शिकायत के आधार पर पुलिस ने विभिन्न आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की और मामले की जांच शुरू की।
एफआईआर में भारतीय दंड कानून की विभिन्न धाराओं के साथ मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 के तहत भी कार्रवाई की गई है। इसके बाद आरोपियों ने एफआईआर को चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि एफआईआर में प्रथम दृष्टया गंभीर और संज्ञेय अपराधों के आरोप दर्ज हैं। ऐसे मामलों में जांच पूरी होने से पहले एफआईआर रद्द करना न्यायोचित नहीं होगा।
अदालत ने कहा कि यदि किसी महिला के साथ अपराध हुआ है, तो निष्पक्ष जांच होना और कानून के अनुसार कार्रवाई किया जाना आवश्यक है। जांच के दौरान सभी पक्षों के साक्ष्यों और तथ्यों का परीक्षण किया जाएगा, जिसके बाद ही आगे की कानूनी प्रक्रिया तय होगी।
अपने आदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि निकाह, हलाला और तीन तलाक जैसी धार्मिक प्रथाओं के नाम पर महिलाओं का यौन शोषण किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी धार्मिक परंपरा या व्यक्तिगत कानून का उपयोग अपराध को छिपाने या उसे वैध ठहराने के लिए किया जाता है, तो भारतीय संविधान और आपराधिक कानून को प्राथमिकता दी जाएगी।
कोर्ट ने यह भी कहा कि महिलाओं की गरिमा, समानता और जीवन के अधिकार की रक्षा करना संविधान की मूल भावना है और किसी भी परंपरा के नाम पर इन अधिकारों का उल्लंघन नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को समानता, गरिमा और न्याय का अधिकार देता है।
अदालत के अनुसार यदि किसी मामले में दुष्कर्म, यौन शोषण, धमकी या अन्य संज्ञेय अपराध के आरोप सामने आते हैं, तो ऐसे मामलों में भारतीय आपराधिक कानून लागू होगा। कोई भी धार्मिक या व्यक्तिगत कानून किसी अपराध को वैध नहीं बना सकता।
कोर्ट ने ऐसी घटनाओं को समाज के लिए चिंताजनक बताते हुए कहा कि महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता।
गौरतलब है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट और देश की अन्य अदालतें पहले भी तीन तलाक और महिलाओं के अधिकारों से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण टिप्पणियां कर चुकी हैं।
साल 2019 में केंद्र सरकार ने मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम लागू किया था, जिसके तहत तत्काल तीन तलाक (Instant Triple Talaq) को दंडनीय अपराध घोषित किया गया।
इसके बाद यदि किसी महिला को तीन तलाक या हलाला के नाम पर जबरन प्रताड़ित किया जाता है या उसके साथ अपराध होता है, तो उसके खिलाफ भारतीय कानून के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हाईकोर्ट की यह टिप्पणी केवल एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा को लेकर एक महत्वपूर्ण संदेश भी देती है।
विशेषज्ञों के अनुसार धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार संविधान द्वारा संरक्षित है, लेकिन यदि किसी धार्मिक प्रथा का दुरुपयोग कर किसी महिला के साथ अपराध किया जाता है, तो कानून हस्तक्षेप करेगा और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
फिलहाल यह मामला जांच के अधीन है। हाईकोर्ट ने केवल एफआईआर रद्द करने से इनकार किया है और पुलिस को निष्पक्ष जांच जारी रखने की अनुमति दी है।
अदालत ने इस चरण में आरोपों की सत्यता पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है। मामले में दर्ज आरोपों की पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगी। जांच एजेंसियां साक्ष्य जुटाने, गवाहों के बयान दर्ज करने और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर आगे की कार्रवाई करेंगी।