उत्तर प्रदेश सरकार सरकारी विद्यालयों को निजी स्कूलों की तर्ज पर विकसित करने और स्मार्ट क्लास, स्वच्छ पेयजल, बेहतर बैठने की व्यवस्था तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने का दावा करती है। लेकिन महुआ मुहिम के रियलिटी चेक में महाराजगंज जिले के फरेंदा क्षेत्र के कई प्राथमिक, जूनियर और कंपोजिट विद्यालयों की तस्वीर इन दावों से बिल्कुल अलग नजर आई।
कहीं हैंडपंप खराब, कहीं पानी और शौचालय की समस्या
रियलिटी चेक के दौरान कई विद्यालयों में मूलभूत सुविधाओं का अभाव देखने को मिला। कहीं हैंडपंप खराब मिला तो कहीं पानी की टोटियां नहीं थीं। कई विद्यालयों की दीवारें जर्जर अवस्था में मिलीं, जबकि कुछ जगहों पर साफ-सफाई और रखरखाव की भी कमी दिखाई दी।
स्मार्ट क्लास बने, लेकिन ताले में कैद
सरकार की महत्वाकांक्षी स्मार्ट क्लास योजना भी कई स्कूलों में केवल कागजों तक सीमित नजर आई। कई कंपोजिट विद्यालयों में स्मार्ट क्लास के कमरे तो बने हुए हैं, लेकिन उन पर ताले लटक रहे हैं। जहां स्मार्ट क्लास शुरू होनी चाहिए थी, वहां बच्चे आज भी आधुनिक शिक्षा से वंचित दिखाई दिए।
प्रधानाध्यापक और शिक्षक मिले नदारद
रियलिटी चेक के दौरान कुछ विद्यालयों में प्रधानाध्यापक की कुर्सी खाली मिली। कई स्थानों पर शिक्षक भी अनुपस्थित पाए गए। एक कंपोजिट विद्यालय में जहां कुल 11 शिक्षकों की नियुक्ति है, वहां मौके पर केवल 5 शिक्षक ही मौजूद मिले। ऐसे में सवाल उठता है कि सीमित शिक्षकों के भरोसे सभी कक्षाओं की पढ़ाई कैसे संचालित हो रही होगी।
बच्चों की पढ़ाई पर पड़ रहा असर
विद्यालयों में शिक्षकों की कमी और बुनियादी सुविधाओं के अभाव का सीधा असर छात्रों की पढ़ाई पर पड़ रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते इन समस्याओं का समाधान नहीं किया गया तो बच्चों की शिक्षा और भविष्य दोनों प्रभावित होंगे।
सरकारी दावों पर उठे सवाल
महुआ मुहिम के इस रियलिटी चेक ने सरकारी स्कूलों की जमीनी स्थिति को सामने ला दिया है। अब सवाल यह है कि जब स्कूलों में शिक्षक, पेयजल, रखरखाव और स्मार्ट क्लास जैसी बुनियादी सुविधाएं ही पूरी तरह उपलब्ध नहीं हैं, तो सरकारी स्कूलों को निजी विद्यालयों के बराबर बनाने के दावे कितने प्रभावी साबित हो रहे हैं।