नई दिल्ली: नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे स्वयंभू धर्मगुरु आसाराम को फिलहाल सुप्रीम कोर्ट से कोई राहत नहीं मिली है। उम्र और खराब स्वास्थ्य का हवाला देते हुए दायर अंतरिम जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल जमानत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि राजस्थान सरकार का पक्ष सुने बिना इस स्तर पर कोई अंतरिम आदेश पारित करना उचित नहीं होगा। इसके साथ ही कोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि आसाराम ने अपनी बढ़ती उम्र और गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का हवाला देते हुए मेडिकल आधार पर अंतरिम जमानत की मांग की है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस दलील पर अंतिम राय देने से पहले सभी पक्षों को सुनने की आवश्यकता बताई है।

आसाराम वर्ष 2013 में दर्ज नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में दोषी ठहराए जा चुके हैं। वर्ष 2018 में जोधपुर स्थित विशेष POCSO अदालत ने उन्हें दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य और गवाहों के आधार पर आरोप सिद्ध होते हैं।
इसके बाद आसाराम ने इस फैसले को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हालांकि हाईकोर्ट ने भी विशेष अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए उनकी सजा में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुनवाई के दौरान आसाराम की ओर से पेश वरिष्ठ वकीलों ने अदालत को बताया कि उनकी आयु 85 वर्ष से अधिक हो चुकी है और वे कई गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं। उनका कहना था कि उम्र और स्वास्थ्य की स्थिति को देखते हुए उन्हें अंतरिम जमानत दी जानी चाहिए ताकि वे बेहतर इलाज करा सकें।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी दलील दी गई कि लगातार जेल में रहने के कारण उनकी स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ती जा रही हैं और चिकित्सा आधार पर उन्हें राहत मिलनी चाहिए।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को सुनने के बाद कहा कि मामला गंभीर प्रकृति का है और बिना राजस्थान सरकार का पक्ष सुने किसी भी प्रकार की अंतरिम राहत देना उचित नहीं होगा।
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सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि आरोपी एक प्रभावशाली व्यक्ति हैं और ऐसे मामलों में अदालत को सभी तथ्यों पर सावधानीपूर्वक विचार करना आवश्यक होता है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि केवल उम्र या स्वास्थ्य का हवाला पर्याप्त नहीं माना जा सकता, बल्कि मेडिकल रिकॉर्ड, उपलब्ध चिकित्सा सुविधाएं और राज्य सरकार का पक्ष भी महत्वपूर्ण होगा।
इसी कारण अदालत ने फिलहाल अंतरिम जमानत देने से इनकार करते हुए राजस्थान सरकार को नोटिस जारी किया और जवाब मांगा है।
कानूनी दृष्टि से यह समझना महत्वपूर्ण है कि सुप्रीम कोर्ट ने आसाराम की याचिका खारिज नहीं की है। अदालत ने केवल तत्काल अंतरिम राहत देने से इनकार किया है।
अब अगली सुनवाई में राजस्थान सरकार अपना पक्ष रखेगी। इसके बाद अदालत उपलब्ध मेडिकल दस्तावेजों, स्वास्थ्य रिपोर्ट और अन्य कानूनी पहलुओं पर विचार करते हुए निर्णय लेगी कि अंतरिम जमानत दी जाए या नहीं।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी दोषी या आरोपी को मेडिकल आधार पर अंतरिम जमानत देने का निर्णय कई कारकों पर निर्भर करता है। अदालत केवल बीमारी का दावा सुनकर राहत नहीं देती, बल्कि यह भी देखती है कि—
इन सभी पहलुओं का मूल्यांकन करने के बाद ही अदालत कोई फैसला सुनाती है।
यह पहली बार नहीं है जब आसाराम ने स्वास्थ्य संबंधी कारणों का हवाला देकर अदालत से राहत मांगी हो। इससे पहले भी विभिन्न अदालतों में उन्होंने चिकित्सा आधार पर जमानत या अस्थायी राहत की मांग की थी। कुछ मामलों में उन्हें सीमित अवधि के लिए चिकित्सकीय आधार पर राहत मिली, जबकि कई बार अदालतों ने उनकी याचिकाएं खारिज भी कीं।
हर बार अदालत ने उपलब्ध मेडिकल रिपोर्ट और मामले की परिस्थितियों के आधार पर अलग-अलग निर्णय लिया।
अब इस मामले में सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर हैं। राजस्थान सरकार के जवाब और मेडिकल रिकॉर्ड के आधार पर अदालत यह तय करेगी कि आसाराम को अंतरिम जमानत दी जाए या नहीं।
यदि अदालत को लगता है कि जेल में पर्याप्त चिकित्सा सुविधा उपलब्ध है, तो जमानत की मांग खारिज की जा सकती है। वहीं यदि मेडिकल परिस्थितियां असाधारण पाई जाती हैं, तो अदालत उचित शर्तों के साथ अंतरिम राहत देने पर विचार कर सकती है।