पश्चिम चंपारण के बगहा व्यवहार न्यायालय ने मानव तस्करी के एक चर्चित मामले में सख्त फैसला सुनाते हुए पश्चिम बंगाल के आसनसोल निवासी मां-बेटे को आजीवन सश्रम कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने दोनों दोषियों पर एक-एक लाख रुपये का अर्थदंड भी लगाया है। जुर्माना नहीं देने पर तीन वर्ष का अतिरिक्त कठोर कारावास भुगतना होगा।
24 दिनों में पूरा हुआ स्पीडी ट्रायल
जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश (एडीजे-4) मानवेन्द्र मिश्र की अदालत ने महज 24 दिनों में स्पीडी ट्रायल पूरा कर यह फैसला सुनाया। इस त्वरित न्यायिक प्रक्रिया को मानव तस्करी जैसे गंभीर अपराधों के खिलाफ एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
तीन नाबालिग बच्चियों की तस्करी का था मामला
यह मामला बगहा के नौरंगिया थाना क्षेत्र का है, जहां से सात, आठ और ग्यारह वर्ष की तीन नाबालिग बच्चियों को कथित तौर पर झाड़-फूंक और बेहतर भविष्य का झांसा देकर पश्चिम बंगाल ले जाया जा रहा था। सूचना मिलने पर मानव व्यापार निरोधक इकाई और नौरंगिया थाना पुलिस ने समय रहते कार्रवाई करते हुए तीनों बच्चियों को सुरक्षित मुक्त कराया और दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया।
रेल टिकट समेत कई अहम साक्ष्य बने आधार
सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने रेल टिकट, उम्र सत्यापन रिपोर्ट, जब्ती सूची और प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही समेत कई साक्ष्य अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए। अदालत ने इन साक्ष्यों के आधार पर दोनों आरोपियों को दोषी करार दिया।
'मानव तस्करी मूल अधिकारों पर हमला'
अपने फैसले में अदालत ने कहा कि मानव तस्करी केवल एक आपराधिक कृत्य नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद-21 और अनुच्छेद-23 के तहत नागरिकों को प्राप्त मूल अधिकारों पर सीधा हमला है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे अपराधों में किसी भी प्रकार की नरमी समाज के हित में नहीं हो सकती।
रियायत की मांग अदालत ने की खारिज
बचाव पक्ष ने आरोपियों को परिवार का एकमात्र कमाऊ सदस्य बताते हुए सजा में राहत की मांग की थी, लेकिन अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया और कड़ी सजा सुनाई।
'अपराधियों में पैदा होगा भय'
अपर लोक अभियोजक (एपीपी) जितेंद्र भारती ने कहा कि स्पीडी ट्रायल के जरिए इतने कम समय में सजा दिलाना मानव तस्करों के लिए कड़ा संदेश है। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस फैसले से मानव तस्करी में शामिल अपराधियों में भय पैदा होगा और ऐसे मामलों में कमी आएगी।
देशभर के लिए बना कड़ा संदेश
बगहा कोर्ट का यह फैसला न केवल तीन मासूम बच्चियों को न्याय दिलाने वाला माना जा रहा है, बल्कि मानव तस्करी के खिलाफ सख्त न्यायिक कार्रवाई का एक महत्वपूर्ण उदाहरण भी बनकर सामने आया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के फैसले भविष्य में ऐसे अपराधों पर अंकुश लगाने में सहायक साबित हो सकते हैं।