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सिंधु जल संधि पर फिर बढ़ा भारत-पाकिस्तान तनाव, बिलावल भुट्टो के बयान के बाद तेज हुई चर्चा

प्रकाशित: 07-07-2026 08:03 AM
सिंधु जल संधि पर फिर बढ़ा भारत-पाकिस्तान तनाव, बिलावल भुट्टो के बयान के बाद तेज हुई चर्चा
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नई दिल्ली/इस्लामाबाद: भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को लेकर एक बार फिर कूटनीतिक तनाव चर्चा का विषय बन गया है। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो जरदारी के हालिया बयान के बाद इस मुद्दे ने नया राजनीतिक और रणनीतिक महत्व हासिल कर लिया है। उन्होंने भारत से सिंधु जल संधि को बहाल करने की मांग करते हुए कहा कि यदि ऐसा नहीं किया गया तो पाकिस्तान अपने अधिकारों की रक्षा के लिए "हर मोर्चे पर जवाब देने के लिए तैयार" है।

हालांकि बिलावल भुट्टो ने अपने बयान में यह भी कहा कि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय कानून और कूटनीतिक माध्यमों के जरिए इस मुद्दे का समाधान चाहता है। उनके इस बयान को भारत के हालिया रुख के जवाब के तौर पर देखा जा रहा है।

भारत ने क्यों बदला अपना रुख?

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भारत ने अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि को निलंबित रखने का फैसला किया था। केंद्र सरकार का कहना है कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को समर्थन देना पूरी तरह बंद नहीं करता, तब तक दोनों देशों के बीच सामान्य संबंध बहाल करना संभव नहीं है।

भारत लगातार यह दोहराता रहा है कि "आतंकवाद और सामान्य द्विपक्षीय संबंध साथ-साथ नहीं चल सकते।" इसी नीति के तहत सरकार ने संधि को लेकर भी अपना रुख सख्त बनाए रखा है।

क्या बोले बिलावल भुट्टो?

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पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो जरदारी ने कहा कि सिंधु जल संधि पाकिस्तान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण समझौता है और इसे बहाल किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान अपने जल अधिकारों की रक्षा के लिए हर संभव कदम उठाएगा।

साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पाकिस्तान इस विवाद का समाधान अंतरराष्ट्रीय कानून और कूटनीतिक प्रयासों के माध्यम से चाहता है। फिलहाल पाकिस्तान सरकार की ओर से इस विषय पर किसी नई औपचारिक वार्ता की घोषणा नहीं की गई है।

क्या है सिंधु जल संधि?

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सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) पर वर्ष 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हस्ताक्षर हुए थे। इस समझौते को विश्व बैंक की मध्यस्थता में अंतिम रूप दिया गया था।

इस संधि के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह प्रमुख नदियों के जल के उपयोग और बंटवारे को लेकर दोनों देशों के अधिकार और दायित्व तय किए गए थे। कई दशकों तक इसे भारत-पाकिस्तान के बीच सबसे सफल द्विपक्षीय समझौतों में से एक माना जाता रहा।

हाल के वर्षों में क्यों बढ़ा विवाद?

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पिछले कुछ वर्षों में सीमा पार आतंकवाद, सुरक्षा संबंधी चिंताओं और दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव के कारण सिंधु जल संधि को लेकर मतभेद लगातार गहराते गए हैं।

भारत का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा उसके लिए सर्वोच्च प्राथमिकता है। सरकार का मानना है कि आतंकवाद पर प्रभावी और ठोस कार्रवाई के बिना द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य रूप से आगे बढ़ाना संभव नहीं है।

वहीं पाकिस्तान लगातार यह कहता रहा है कि जल संसाधनों से जुड़े समझौतों का पालन अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के अनुरूप होना चाहिए और संधि को प्रभावित नहीं किया जाना चाहिए।

विशेषज्ञों की राय

अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि जल संसाधन जैसे संवेदनशील विषयों पर दोनों देशों के बीच संवाद और कूटनीतिक प्रयास बेहद महत्वपूर्ण हैं। उनका कहना है कि ऐसे विवादों का समाधान अंतरराष्ट्रीय कानून, आपसी बातचीत और स्थापित तंत्र के माध्यम से ही अधिक प्रभावी ढंग से निकाला जा सकता है।

साथ ही विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि भारत और पाकिस्तान के बीच सुरक्षा संबंधी मुद्दे और सीमा पार आतंकवाद इस विवाद को और जटिल बना रहे हैं।

फिलहाल क्या है स्थिति?

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वर्तमान में भारत ने सिंधु जल संधि को लेकर अपने रुख में कोई बदलाव नहीं किया है। दूसरी ओर पाकिस्तान लगातार संधि को बहाल करने की मांग दोहरा रहा है।

अब इस पूरे मामले पर दोनों देशों की आगामी कूटनीतिक रणनीति, संभावित वार्ताओं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाले घटनाक्रमों पर सभी की नजर बनी हुई है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दोनों देश इस संवेदनशील मुद्दे को किस दिशा में आगे बढ़ाते हैं।

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