विचार: नए युग का उपनिवेशवाद
प्रकाशित: 29-08-2026 | 08:00 AM
विचार: नए युग का उपनिवेशवादयदि 60 करोड़ लोग रोज एक घंटा भी दें तो हम हर दिन लगभग 68 हजार वर्षों के बराबर मानवीय-समय अंगूठे से स्क्राल करने में झोंक रहे हैंBy Srijan Pal SinghEdited By: Swaraj Srivastava Fri, 28 Aug 2026 11:26 PM (IST)HighLightsयुवा प्रतिदिन घंटों शॉर्ट वीडियो रील्स पर बिताते हैं।विदेशी एल्गोरिदम युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य और ध्यान को प्रभावित करते हैं।सख्त कानून, 'यूथ मोड' और शिक्षाप्रद सामग्री आवश्यक है। सृजन पाल सिंह। पिछले दिनों एक विश्वविद्यालय में मैंने छात्रों से पूछा कि दिन भर में रील्स देखने में उनका कितना समय जाता है? अधिकांश छात्रों ने कहा औसतन दो से चार घंटे, लेकिन एक छात्र का उत्तर भीतर तक उतर गया। उसने कहा, "सर, पता ही नहीं चलता। अंगूठा अपने आप चलता रहता है।" यही समस्या का सार है कि करोड़ों युवा रोज घंटों वह देख रहे हैं, जिसे देखने का निर्णय उन्होंने स्वयं नहीं लिया। यह अकेला किस्सा नहीं है। बेन एंड कंपनी के अध्ययन के अनुसार लगभग 60 करोड़ भारतीय शार्ट वीडियो देखते हैं और सक्रिय उपयोगकर्ता रोज 55 से 60 मिनट इन पर बिताते हैं। यदि 60 करोड़ लोग रोज एक घंटा भी दें तो हम हर दिन लगभग 68 हजार वर्षों के बराबर मानवीय-समय अंगूठे से स्क्राल करने में झोंक रहे हैं। जिस देश की आधी आबादी 25 वर्ष से कम हो, वहां यह स्वाभाविक रूप से राष्ट्रीय उत्पादकता और मानसिक स्वास्थ्य का एक ज्वलंत प्रश्न बन जाता है। विज्ञान इस चिंता की पुष्टि करता है। हर 15-30 सेकंड में बदलती रील मस्तिष्क को भावनाओं के झूले पर बिठा देती है। एक क्षण हंसी, अगले क्षण क्रोध, फिर संगीत, फिर कुछ त्रासदी। मनोविज्ञानी इसे भावनात्मक 'माइक्रो-शाक' कहते हैं, जिसमें डोपामिन तंत्र जुए की मशीन की तरह बार-बार उत्तेजित होता है। चीन की झेजियांग यूनिवर्सिटी के एफएमआरआई अध्ययन के अनुसार ये रील्स मस्तिष्क के लत से जुड़े केंद्रों को सक्रिय कर आत्म-नियंत्रण कमजोर करती हैं। प्रोफेसर ग्लोरिया मार्क के शोध के अनुसार स्क्रीन पर औसत ध्यान 2004 में ढाई मिनट था, जो अब मात्र 47 सेकंड रह गया है। जिस सभ्यता ने ध्यान और एकाग्रता को विज्ञान का दर्जा दिया, उसी की युवा पीढ़ी का ध्यान आज भटक-भटक कर नीलाम हो रहा है। अब असल प्रश्न यही कि यह तय कौन करता है कि हमारे बच्चे क्या देखें? न बच्चा, न माता-पिता, न शिक्षक और न सरकार। यह निर्णय विदेशी सर्वरों पर बैठे एल्गोरिदम करते हैं, जिनका लक्ष्य है दर्शक को अधिकतम देर स्क्रीन से चिपकाए रखना। यहां उन रचनाकारों को नमन जरूरी है जो सार्थक कंटेंट गढ़ रहे हैं। कोई छोटे शहर से बच्चों को भौतिकी पढ़ा रहा है, तो कोई किसानों तक नई तकनीक पहुंचा रहा है। ये सच्चे राष्ट्र-निर्माता हैं, पर हमारी बड़ी चूक यह रही कि हमने बुद्धिमत्ता को नायकत्व नहीं दिया। मंच और स्टारडम मनोरंजन को मिल रहा है, ज्ञान को नहीं। इसीलिए युवा उनकी ओर कम खिंचते हैं। डा. कलाम प्रमाण थे कि विज्ञानी भी युवाओं का महानायक बन सकता है, लेकिन ऐसी आवाज कितनों तक पहुंचेगी और किसे कमाई मिलेगी, यह वही एल्गोरिदम तय करता है, जो हमारे नियंत्रण से बाहर है। जब करोड़ों युवाओं का ध्यान और महत्वाकांक्षा विदेशी नियंता तय करें, तो यह भारतीय मन की पराधीनता ही है। यह नए युग का उपनिवेशवाद है। इसका प्रमाण चाहिए तो एक ही कंपनी के दो चेहरे देखिए। टिकटाक की मालिक बाइटडांस चीन में इसी एप का घरेलू संस्करण 'डोयिन' चलाती है। वहां 14 वर्ष से छोटे बच्चों को दिन में केवल 40 मिनट मिलते हैं, रात 10 से सुबह छह तक एप बंद रहता है और फीड में विज्ञान, विरासत और इतिहास दिखता है। शेष विश्व को वही कंपनी उलझाए रखने वाला संस्करण देती है। ट्रिस्टन हैरिस ने इसे 'अपने बच्चों के लिए पालक, दुनिया के बच्चों के लिए अफीम' कहा है। एक सर्वेक्षण में अमेरिकी किशोरों का सपना इन्फ्लुएंसर बनना निकला, जबकि चीनी किशोरों का अंतरिक्ष यात्री। स्पष्ट है कि प्राथमिकता वही तय करता है, जिसके हाथ में चाबी है। हालांकि इस विकराल होते जा रहे खतरे के प्रति दुनिया जाग भी रही है। आस्ट्रेलिया ने 10 दिसंबर, 2025 से 16 वर्ष से छोटे बच्चों के इंस्टाग्राम, यूट्यूब और टिकटाक समेत दस प्लेटफार्मों पर खाते प्रतिबंधित कर दिए और लगभग 275 करोड़ रुपये तक का जुर्माना लगाया है। करीब 50 लाख खाते बंद हुए, फिर भी दस में आठ बच्चे किसी न किसी रास्ते से पहुंच बना ले रहे हैं। यही सुबूत है कि केवल ताला लगाना काफी नहीं, ढांचा भी बदलना होगा। यूरोपीय संघ प्रोफाइलिंग-मुक्त फीड का विकल्प अनिवार्य करता है। चीन में 2022 से एल्गोरिदम का सरकारी पंजीकरण जरूरी है। और भारत? हमने 2020 में टिकटाक पर प्रतिबंध लगाने का साहस दिखाया था और अब डीपीडीपी कानून की धारा 9(3) बच्चों की प्रोफाइलिंग तथा लक्षित विज्ञापन पर रोक लगाती है, मगर इस पर अमल मई 2027 से होना है। कानून बन चुका है, पर असली परीक्षा उसे लागू कर उसे धारदार एवं असरदार बनाने की है। फिलहाल हम क्या करें? सबसे पहले तो धारा 9(3) पर अमल जल्द और सख्ती से हो। कोई भी प्लेटफार्म अपने एल्गोरिदम का स्वतंत्र आडिट कराए और हर उपयोगकर्ता को बिना-एल्गोरिदम सीधी फीड का विकल्प दें। भारत में क्या दिखेगा, यह भारत के नियम तय करें, विदेशी गणित नहीं। दूसरा, नाबालिगों के लिए 'यूथ मोड' अनिवार्य हो। समयसीमा, रात्रि अवकाश और आयु-सत्यापन, जैसा चीन और आस्ट्रेलिया ने किया। तीसरा, बुद्धिमत्ता को नायकत्व और लाभ, दोनों दें। श्रेष्ठ शिक्षाप्रद रचनाकारों को राष्ट्रीय मंच मिले और नाबालिगों की फीड में शिक्षाप्रद सामग्री का न्यूनतम अनुपात हो। सरकार टेलीकाम कंपनियों संग 'लर्न एंड अर्न' माडल लाए। विज्ञान, परीक्षा-तैयारी और कौशल कंटेंट देखने पर डाटा सस्ता पड़े या मुफ्त डाटा अर्जित हो। ज्ञान अर्जित करना सदैव मनोरंजन से सस्ता होना चाहिए। चौथा, बदलाव घर से शुरू हो। भोजन और अध्ययन के समय स्क्रीन-मुक्त घंटे, साप्ताहिक रूप से 'डिजिटल उपवास' और विद्यालयों में भी एकाग्रता का अभ्यास किया जाए। डॉ. कलाम कहा करते थे कि युवाओं का प्रज्वलित मन धरती के ऊपर, धरती पर और धरती के नीचे का सबसे शक्तिशाली संसाधन है। आज उसी मन को प्रज्वलित करने वाली चाबी विदेशी एल्गोरिदम के हाथों में जा रही है। हमें यह चाबी वापस लेनी होगी, ताकि स्क्रीन हमारे युवाओं के लिए दुनिया देखने की खिड़की बने, उन्हें बांधने वाली बेड़ी नहीं। (पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के सलाहकार रहे लेखक कलाम सेंटर के संस्थापक हैं)