दक्षिण भारत पर अपनी पकड़ मजबूत करने को तैयार RSS! तमिलनाडु में मोहन भागवत के ‘हिंदुत्व’ रणनीति से राजनीतिक गतिविधियां तेज; क्या डीएमके को होंगी चुनौतियां?

Mohan Bhagwat: दक्षिण का राजनीतिक तापमान तेजी से बढ़ता दिखाई दे रहा है। तिरुपरंकुंद्रम पहाड़ी के कार्तिगई दीपम विवाद के संदर्भ में संघ प्रमुख ने ऐसा बयान दिया है जिसने तमिलनाडु की राजनीति में हलचल मचा दी है। मोहन भागवत की प्रदेश में उपस्थिति सत्तारूढ़ डीएमके के लिए चिंता का कारण बन चुकी है। मंदिर और दरगाह के अधिकार के बीच उठे विवाद के बीच मोहन भागवत ने ‘हिंदुत्व योजना’ प्रस्तुत की है। आरएसएस प्रमुख का कहना है कि तमिलनाडु में हिंदुओं की जागरूकता यहां के लिए आवश्यक परिणाम प्रदान करेगी।

संघ प्रमुख का ऐसा कहना दक्षिण के किले को फतह करने की उनकी रणनीति का संकेत है। तमिलनाडु के चुनाव 2026 से पहले मोहन भागवत ने स्वयंसेवकों को यह निर्देश दिया है कि वे संघ की विचारधारा का प्रसार करें। यह साफ दर्शाता है कि संघ इस बार डीएमके को मैदान खाली छोड़ने वाला नहीं है। ऐसे में प्रश्न है कि क्या एमके स्टालिन के नेतृत्व वाली डीएमके की समस्याएँ बढ़ सकती हैं? चलिए इस सवाल का जवाब खोजने के लिए विस्तार से चर्चा करते हैं।

तमिलनाडु में Mohan Bhagwat के ‘हिंदुत्व’ योजना से राजनीति में हलचल!

दक्षिण के अभेद राजनीतिक किले को तोड़ने के लिए आरएसएस लगभग तैयार है। इसी बीच, मोहन भागवत ने संघ के 100 वर्ष पूरे होने पर तमिलनाडु का दौरा किया है।

संघ प्रमुख ने कहा है कि “यदि तिरुपरंकुंद्रम मुद्दे को आगे बढ़ाने की आवश्यकता पड़े, तो ऐसा किया जाएगा। लेकिन मुझे नहीं लगता कि इसकी आवश्यकता है। मामला अभी न्यायालय में है। इसे सुलझने दें। मुझे लगता है कि तमिलनाडु में हिंदुओं की जागरूकता अपेक्षित परिणाम लाने के लिए पर्याप्त है। यदि इसकी आवश्यकता होगी, तो तमिलनाडु में कार्यरत हिंदू संगठन हमें सूचित करेंगे, तब हम इस पर विचार करेंगे। मुझे लगता है कि राज्य में हिंदुओं की संख्या के आधार पर इस मुद्दे का समाधान यहीं हो सकता है। हमें इसे आगे बढ़ाने की आवश्यकता नहीं होगी। इस मुद्दे का समाधान हिंदुओं के हित में होना चाहिए। यह निश्चित है, और हम इसके लिए हर संभव प्रयास करेंगे।”

मोहन भागवत के अपने संबोधन में अपने कई बार हिंदु हित का उल्लेख करना उनके हिंदुत्व योजना को दर्शाता है। इसको लेकर सूबे में राजनीतिक हलचल भी तेज हो गई है और चर्चाओं का दौर जारी है।

क्या डीएमके की समस्याएँ बढ़ेंगी?

प्रदेश में मजबूत स्थिति में बैठे डीएमके के लिए वर्ष 2026 का चुनावी क्षेत्र आसान नहीं रहने वाला है। एक ओर प्रसिद्ध अभिनेता विजय की टीवीके सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए चुनौती पेश कर रही है, तो वहीं दूसरी ओर बीजेपी भी धीरे-धीरे प्रदेश में अपनी जड़ें स्थापित करने की कोशिश में है। आरएसएस प्रमुख अपने कार्यकर्ताओं से संघ की विचारधारा का प्रसार करने की बात कह चुके हैं। बीजेपी अपने संगठनात्मक शैली से धीरे-धीरे प्रभाव बढ़ा रही है।

लोकसभा चुनाव 2024 में इसका प्रभाव भी दिखाई दिया जब बीजेपी को 3.6 फीसदी वोट मिले। बीजेपी ने वाम दलों के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन करते हुए आगामी चुनाव के लिए अपनी तैयारियाँ शुरू कर दी हैं। यह साफ संकेत है कि डीएमके और कांग्रेस के लिए अगला चुनाव आसान नहीं होने वाला है। डीएमके की समस्याएँ बढ़ेंगी या नहीं, यह बाद की बात है, लेकिन यह निश्चित है कि केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी मजबूती से राज्य में अपनी उपस्थिति दर्ज कराएगी।

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